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बेसिक ज्योतिष

ॐ गणेशाय नमः
ॐ नमः शिवाय
जय माता दी
यह पोस्ट ज्योतिष की बेसिक जानकारी के लिए कुछ सवाल जवाब के साथ है, इसमें आप जानेगे कि ज्योतिष क्या है इसके महत्वपूर्ण अंग क्या है और इसका मानव जीवन पर प्रभाव कैसे पड़ता है अगर आपको यह पोस्ट पसंद आए तो कमेंट द्वारा हमारा  हौसला  अफजाई जरूर करे ताकि हमे आगे की पोस्ट बनाने की प्रेरणा मिलती रहे, और अपने दोस्तो के साथ शेयर भी जरूर कीजिए,  आप यह पोस्ट https://deepjyotish.blogspot.com पर पढ़ रहे है और मै हू DEEPJYOTISH एक ब्लॉगर आइए जानते है आज की पोस्ट के बारे में
प्रश्न १:- ज्योतिष क्या है?
उत्तर :- आकाश मंडल में उपस्थित ग्रह, नक्षत्र इत्यादि के अध्ययन को ही ज्योतिष कहा जाता है, इसके मुख्य दो भाग है एक गणित और दूसरा फलित। गणित ज्योतिष में आकाश मंडल में उपस्थित ग्रहों की पोजिशन देखी जाती है जिसे आजकल खगोलशास्त्री आधुनिक उपकरणों की सहायता से करते है और फलित ज्योतिष के अंतर्गत उन ग्रहों नक्षत्रों का पृथ्वी, मानव जीवन और अन्य चर अचर जीव, वस्तुएं इत्यादि पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया जाता है।
प्रश्न २:- आकाश में उपस्थित ग्रह जो कि प्रथ्वी से इतनी दूर है उनका प्रभाव कैसे पड़ता है? असम्भव सा लगता है।
उत्तर :- अंतरिक्ष में सभी ग्रह एक निश्चित अक्ष पर अपनी धुरी पर घूम रहे है कैसे ? गुरुत्वाकर्षण बल के द्वारा न , ये सभी इसी बल के द्वारा एक दूसरे से बंधे है जब शनि सूर्य से इतनी दूर होकर भी सूर्य के चारो तरफ घूम सकता है तो प्रथ्वी तो फिर भी पास है, एक उदाहरण और लेते है हम सभी जानते है कि चन्द्र के गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव समुंद्र पर पड़ता है जिस कारण ज्वार भटा आता है तो हमारे शरीर में भी तो 70% से ज्यादा पानी की मात्रा है फिर हमारे ऊपर क्यों नहीं? ठीक ऐसे ही सभी ग्रहों की गुरुत्वाकर्षण बल एक दूसरे को इफेक्ट देते ही है, धूर्णन गति के कारण कभी पास आते है तो प्रभाव ज्यादा पड़ता है दूर जाते है तो कम हो जाता है।

प्रश्न ३:- चलो मान लिया कि सभी ग्रहों का प्रभाव प्रथ्वी पर पड़ता है तो फिर पूरी प्रथ्वी पर एक समान फर्क पड़ना चाहिए, ज्योतिष के अनुसार हर इंसान पर अलग अलग फर्क पड़ता है ऐसा क्यों?
उत्तर :-  प्रथ्वी के अपने अक्ष पर घूमने की वजह से किसी भी ग्रह का प्रभाव किसी एक स्थान पर अधिक व अन्य स्थान पर कम हो सकता है जैसे सूर्य को ही ले ले, जब भारत में दिन होता है तो अमेरिका मे रात , किसी अन्य स्थान पर शाम या सुबह भी हो सकती है ठीक ऐसे ही हर स्थान पर अलग अलग प्रभाव आता है। 

प्रश्न ४:- अगर ज्योतिष ग्रह नक्षत्र आधारित है फिर यह कर्म आधारित कैसे हुई, कहा जाता है कि कर्मो के अनुसार ही फल मिलता है?
उत्तर :- ज्योतिष कर्म आधारित ही है, ये श्रृष्टि का नियम है कि मनुष्य के पिछले जन्मों के कर्म के आधार पर नए जन्म में विशेष ग्रह नक्षत्र के प्रभाव में जन्म होता है।
प्रश्न ५:- ज्योतिष के मुख्य अंग क्या है और इसके द्वारा फलित कैसे होता है?
उत्तर :- यह मुख्य सवाल है। ज्योतिष में जन्म समय पर स्थान विशेष के आधार पर वहा से दिखने वाले आकाश मंडल में उपस्थित ग्रहों नक्षत्रों का एक चित्र लिया जाता है जिसके अध्ययन से हमे व्यक्ति के भाग्य का अनुमान हो सकता है सिर्फ अनुमान , क्युकी हकीकत मे क्या होगा वह केवल ईश्वर ही जानते है, और उस अनुमान के आधार पर समस्या के सामना करने के लिए तैयार होते है। 
ज्योतिष की अनेक शाखाएं है जिनमे भारतीय ज्योतिष और पाश्चात्य ज्योतिष मुख्य है हम केवल भारतीय ज्योतिष की बात करेगे जिसे वैदिक ज्योतिष कहते है और ज्योतिष को वेदांग भी कहा गया है।
भारतीय ज्योतिष मे मुख्य ९ ग्रह है सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, ब्रहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु
 सूर्य आधुनिक युग में एक तारा है लेकिन चुकी इसका प्रभाव प्रथ्वी पर पड़ता है इसलिए वैदिक ज्योतिष में इसे ग्रह की संज्ञा दी गई है, ठीक इसी तरह चन्द्र जो कि एक उपग्रह है उसे भी ग्रह माना गया है, राहु केतु सूर्य चन्द्र के गणितीय बिंदु है जिनका प्रभाव भी मुख्य रूप से पड़ता है जैसे ग्रहण काल में , इसलिए इन्हे भी ग्रह कहा गया है, 
प्रत्येक ग्रह को किसी न किसी देवता से जोड़ा गया है जिनके बारे में हम  www.deepjyotish.blogspot.com पर बाद में जानेंगे।
इसके अलावा कुछ अन्य गणितीय बिंदु भी है जिन्हे उपग्रह कहा जाता है उनके बारे में भी हम बाद मे जानेंगे
प्रथ्वी को केंद्र मानकर पूरे आकाश मंडल ३६०° गोल है जिसे १२ भाग में बांटा गया है जिन्हे राशि कहते है, प्रत्येक राशि ३०° की होती है प्रत्येक राशि का कोई न कोई ग्रह स्वामी दिया गया है, और हर राशि को विभिन्न भागों में सूक्ष्मता से बांटा गया है जिन्हे वर्ग कहते है ये वर्ग जीवन के विभिन्न क्षेत्रों को प्रदर्शित करते है। और आकाश मंडल के ३६०° को २७ भागों में बांट दिया गया है हर भाग १३°२२` का होता है जिन्हे नक्षत्र कहा गया है हर नक्षत्र के एक अधिपति देवता है।
वैदिक ज्योतिष समय आधारित है इसलिए इसका समय निर्धारण भी कुछ अलग है जिसे पंचांग द्वारा निर्धारित करते है यह सौर वर्ष और चन्द्र वर्ष को मिलाकर बनाया गया है, इसके पांच भाग है तिथि, वार, नक्षत्र, योग , करण। 
अब तक हम जान चुके है कि फलित के लिए जन्म समय पर अंतरिक्ष में उपस्थित ग्रहों, राशियों इत्यादि का नक्शा ही महत्वपूर्ण है, जिस समय यह नक्शा लिया जाता है उस समय पूर्व दिशा की ओर जो राशि होती है वह लग्न कहलाती है और आगे १२ भाग तक १२ राशि रहती है इस तरह लग्न को रेफरेंस प्वाइंट मानकर १२ भावो की संरचना की गई है,  और ज्योतिष के नियमों के अनुसार इन भावों का राशि और ग्रह के अनुसार अध्ययन किया जाता है। घटना के समय निर्धारण के लिए दशा, गोचर, ग्रहों के समय का उपयोग किया जाता है।
पोस्ट ज्यादा लम्बी न हो इसलिए इस पोस्ट को यही विराम देते है, अगर आपको यह पोस्ट पसंद आई तो कमेंट और शेयर करके हौसला अफजाई जरूर करे। धन्यवाद। 

Comments

  1. Replies
    1. Thanks sir, मुझे ये जानकर खुशी हुई कि आपको ये पोस्ट पसंद आई , हमारी कोशिश रहेगी आगे भी ऐसी पोस्ट आती रहे। फिर से आपका शुक्रिया

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    1. Thanks sir, मुझे ये जानकर खुशी हुई कि आपको ये पोस्ट पसंद आई , हमारी कोशिश रहेगी आगे भी ऐसी पोस्ट आती रहे। फिर से आपका शुक्रिया

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  3. बहुत इंफोर्मेटिव पोस्ट है।।जितना हमे 3 क्लासेज में पढ़ाया गया था आपने एक ही पोस्ट में बहुत खूबसूरती से बात दिया।।
    🙏💐

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    1. Thanks sir, मुझे ये जानकर खुशी हुई कि आपको ये पोस्ट पसंद आई , हमारी कोशिश रहेगी आगे भी ऐसी पोस्ट आती रहे। फिर से आपका शुक्रिया

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  4. बढिया है जी 👍 👏 👌

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    1. Thanks sir, मुझे ये जानकर खुशी हुई कि आपको ये पोस्ट पसंद आई , हमारी कोशिश रहेगी आगे भी ऐसी पोस्ट आती रहे। फिर से आपका शुक्रिया

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